सऊदी अरब जैसे सैन्य रूप से ताकतवर देश के लिए भी यमन का हूती संगठन चुनौती बना हुआ है. 17 अक्टूबर 2026 को सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक, हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और अहम बुनियादी ढांचे को निशाना बनाकर क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है. आधुनिक हथियारों और रक्षा प्रणालियों के बावजूद इन हमलों को रोकना आसान साबित नहीं हो रहा. आखिर कौन हैं ये हूती विद्रोही, इनकी शुरुआत कैसे हुई और ईरान के साथ इनके संबंधों को लेकर इतना विवाद क्यों है?
हूती विद्रोही कौन हैं और कहां से हुई शुरुआत?
हूती यमन का एक सशस्त्र, राजनीतिक और धार्मिक आंदोलन है, जिसे ‘अंसार अल्लाह’ के नाम से भी जाना जाता है. इसकी जड़ें यमन के उत्तरी हिस्से में रहने वाले जैदी शिया समुदाय से जुड़ी हैं. इस आंदोलन ने 1990 के दशक में धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के साथ तत्कालीन राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह की सरकार के खिलाफ आवाज उठानी शुरू की थी. इसका नाम आंदोलन के प्रमुख संस्थापक हुसैन बदरुद्दीन अल-हूती के नाम पर पड़ा. समय के साथ यह आंदोलन राजनीतिक संघर्ष से आगे बढ़कर एक शक्तिशाली सशस्त्र संगठन बन गया.
ईरान से क्या है हूतियों का कनेक्शन?
हूती विद्रोहियों और ईरान के बीच राजनीतिक तथा सैन्य संबंधों को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है. अमेरिका और सऊदी अरब सहित कई देशों का आरोप है कि ईरान इस संगठन को हथियार, तकनीकी सहायता और प्रशिक्षण उपलब्ध कराता है. हूतियों के पास बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज मिसाइलों और ड्रोन जैसी क्षमताएं होने से उनकी सैन्य ताकत बढ़ी है. हालांकि, ईरान के साथ करीबी संबंध होने के बावजूद हूती अपनी अलग पहचान और हितों के साथ काम करते हैं. इस संगठन को ईरान के क्षेत्रीय सहयोगियों के व्यापक नेटवर्क का हिस्सा भी माना जाता है.
सना पर कब्जे से बदला यमन का राजनीतिक समीकरण
हूती संगठन की ताकत में बड़ा इजाफा 2014 में हुआ, जब उसने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया. इस घटनाक्रम के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार की स्थिति कमजोर हुई और देश में संघर्ष तेज हो गया. 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन में सैन्य हस्तक्षेप किया, जिसका उद्देश्य हूतियों को पीछे हटाकर तत्कालीन सरकार को दोबारा सत्ता में लाना था. लेकिन लंबे सैन्य अभियान के बावजूद हूती उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी यमन के बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण बनाए रखने में सफल रहे. इस संघर्ष ने यमन में गंभीर मानवीय संकट भी पैदा किया.
सऊदी अरब के लिए क्यों चुनौती बने हुए हैं हूती?
हूतियों की सबसे बड़ी ताकत उनकी मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं के साथ यमन का भौगोलिक इलाका है. पहाड़ी क्षेत्रों में मौजूद ठिकानों से वे अपनी सैन्य गतिविधियां संचालित कर सकते हैं और विरोधी देशों के लिए उन्हें पूरी तरह निष्क्रिय करना मुश्किल हो जाता है. हालिया रिपोर्टों के अनुसार, हूतियों ने सऊदी अरब के प्रमुख हवाई अड्डे और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया है. सऊदी अरब के पास आधुनिक अमेरिकी हथियार और वायु रक्षा प्रणालियां होने के बावजूद लगातार होने वाले हमलों को रोकना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है. तेल प्रतिष्ठानों और अहम व्यापार मार्गों के आसपास बढ़ता खतरा इस टकराव को और गंभीर बनाता है.
लाल सागर और वैश्विक व्यापार पर भी पड़ रहा असर
हूती विद्रोहियों की गतिविधियां केवल यमन और सऊदी अरब तक सीमित नहीं हैं. लाल सागर से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों पर हमलों ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री परिवहन और आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्रभावित किया है. यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां से ऊर्जा संसाधनों और दूसरे सामान की बड़ी मात्रा का आवागमन होता है. ऐसे में हूतियों और उनके विरोधियों के बीच बढ़ता संघर्ष जहाजों की सुरक्षा, परिवहन लागत और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जोखिम पैदा करता है. यही वजह है कि हूती संगठन को अब केवल यमन का आंतरिक मुद्दा नहीं, बल्कि मध्य पूर्व की सुरक्षा से जुड़ी बड़ी चुनौती माना जा रहा है.
ये भी पढ़ें: पाकिस्तान में खाने के लाले! दुनिया के 10 बदहाल देशों की लिस्ट में शामिल, नई रिपोर्ट ने चौंकाया