सर्दियों में भी गर्मी का एहसास, पहाड़ों पर कम बर्फबारी और पानी की बढ़ती चिंता. भारत के लिए आने वाला सर्दी का मौसम कई चुनौतियां लेकर आ सकता है. दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान सामान्य से करीब 13 प्रतिशत कम बारिश की खबरों के बीच अब मजबूत होते अल नीनो ने मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है. यदि प्रशांत महासागर में इसकी तीव्रता अनुमान के मुताबिक बढ़ती है, तो देश में सर्दियों का मिजाज बदल सकता है, जिसका असर खेती से लेकर जल संसाधनों तक दिखाई दे सकता है.
दिसंबर में चरम पर पहुंच सकता है अल नीनो
मौसम संबंधी अनुमानों के मुताबिक, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में विकसित हो रहा अल नीनो आने वाले महीनों में और शक्तिशाली हो सकता है. दिसंबर के आसपास इसकी तीव्रता चरम पर पहुंचने की आशंका जताई जा रही है. कुछ अनुमानों में इसे सुपर अल नीनो का संभावित रूप भी बताया जा रहा है. हालांकि, इसकी वास्तविक तीव्रता और भारत के मौसम पर पड़ने वाले असर को लेकर अभी अनिश्चितता बनी हुई है. अल नीनो समुद्र की सतह के तापमान में बदलाव से जुड़ी जलवायु घटना है, जो दुनिया के कई हिस्सों में तापमान और वर्षा के सामान्य पैटर्न को प्रभावित कर सकती है.
कम ठंड और घटती बर्फबारी से खेती पर असर
अगर सर्दियों में तापमान सामान्य से अधिक रहता है और बारिश तथा बर्फबारी में कमी आती है, तो इसका असर कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है. रबी फसलों, खासकर गेहूं जैसी फसलों की बुआई और विकास के लिए अनुकूल तापमान और पर्याप्त मिट्टी की नमी अहम होती है. सर्दियों में अपेक्षाकृत गर्म मौसम फसलों के विकास चक्र को प्रभावित कर सकता है, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में कम बर्फबारी से नदियों और जल स्रोतों को मिलने वाले पानी पर भी असर पड़ने की आशंका है. हालांकि, फसलों पर वास्तविक प्रभाव स्थानीय मौसम, सिंचाई की उपलब्धता और तापमान में होने वाले बदलावों पर निर्भर करेगा.
2027 की गर्मियों में बढ़ सकती है पानी और बिजली की चुनौती
सर्दियों में कम बारिश और बर्फबारी का असर आने वाले महीनों में भी महसूस किया जा सकता है. पहाड़ों में बर्फ का कम जमाव और मिट्टी में नमी की कमी गर्मियों के दौरान जल उपलब्धता पर दबाव बढ़ा सकती है. वहीं, यदि तापमान तेजी से बढ़ता है, तो घरों, उद्योगों और कृषि क्षेत्र में बिजली की मांग भी बढ़ने की संभावना है. मौसम वैज्ञानिकों की चिंताओं के बीच 2027 की शुरुआती गर्मियों में भीषण गर्मी और पानी की किल्लत का जोखिम चर्चा में है. हालांकि, इन परिस्थितियों की गंभीरता इस बात पर निर्भर करेगी कि अल नीनो कितना मजबूत होता है और सर्दियों के दौरान क्षेत्रवार मौसम कैसा रहता है.
क्या 2015-16 के अल नीनो का रिकॉर्ड टूटेगा?
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुमानों के संदर्भ में यह आशंका भी जताई जा रही है कि मौजूदा अल नीनो 2015-16 के मजबूत घटनाक्रम के स्तर को पार कर सकता है. उस अवधि में वैश्विक तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा था और दुनिया के कई क्षेत्रों में मौसम के असामान्य प्रभाव देखे गए थे. हालांकि, किसी नए अल नीनो को पिछले रिकॉर्ड से अधिक शक्तिशाली मानने के लिए ताजा वैज्ञानिक आकलन और समुद्री तापमान के आंकड़े महत्वपूर्ण होंगे. भारत के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती बदलते मौसम के संकेतों के बीच कृषि, जल प्रबंधन और बिजली की जरूरतों की तैयारी करना है, क्योंकि आने वाले महीनों का मौसम देश की खाद्य सुरक्षा और जल उपलब्धता के लिए अहम साबित हो सकता है.
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