Indian Navy: भारतीय नौसेना के पास फिलहाल छह कलवरी क्लास सबमरीन हैं. ये डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां समुद्र के भीतर निगरानी करने, दुश्मन के जहाजों और पनडुब्बियों की गतिविधियों का पता लगाने और जरूरत पड़ने पर हमला करने में सक्षम हैं. नौसेना के सामने पुरानी होती पनडुब्बियों को बदलने और अपनी परिचालन क्षमता बनाए रखने की चुनौती भी है. ऐसे में तीन अतिरिक्त कलवरी क्लास सबमरीन बनाने की योजना मौजूदा बेड़े को मजबूत करने की दिशा में अहम मानी जा रही है.
पाकिस्तान और चीन की बढ़ती ताकत पर भारत की नजर
हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल है. पाकिस्तान चीन के सहयोग से हंगोर क्लास की आधुनिक पनडुब्बियां हासिल कर रहा है. इन पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जो पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की तुलना में पानी के भीतर अधिक समय तक रहने में मदद करती है.
ऐसे माहौल में भारत के लिए अपनी पनडुब्बी क्षमता को मजबूत करना महत्वपूर्ण है. हालांकि, किसी भी देश की नौसैनिक ताकत का आकलन केवल पनडुब्बियों की संख्या से नहीं किया जा सकता. उनकी तकनीक, हथियार प्रणाली, सेंसर, चालक दल का प्रशिक्षण और रखरखाव भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं.
नई कलवरी क्लास सबमरीन में क्या खास हो सकता है?
तीन अतिरिक्त कलवरी क्लास सबमरीन के निर्माण की योजना के तहत मौजूदा डिजाइन में तकनीकी सुधार और आधुनिक हथियार प्रणालियों को शामिल करने पर विचार किया जा सकता है. रिपोर्टों में नए टॉरपीडो और मिसाइलों जैसी क्षमताओं का जिक्र किया गया है, हालांकि इनके अंतिम स्वरूप की पुष्टि संबंधित आधिकारिक विवरण से ही होगी. इस परियोजना से मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड और उससे जुड़ी भारतीय कंपनियों को भी लाभ मिल सकता है. घरेलू स्तर पर पनडुब्बियों के निर्माण से देश में तकनीकी विशेषज्ञता, रक्षा उत्पादन और सप्लाई चेन को मजबूती देने में मदद मिल सकती है.
प्रोजेक्ट 75(I) से कैसे अलग है तीन नई सबमरीन की योजना?
भारत अपनी पनडुब्बी क्षमता बढ़ाने के लिए प्रोजेक्ट 75(I) पर भी काम कर रहा है. इस परियोजना के तहत छह आधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियां बनाने की योजना है, जिनमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक शामिल करने का प्रस्ताव है. इस तकनीक की मदद से पनडुब्बियां बिना सतह पर आए लंबे समय तक पानी के भीतर रह सकती हैं.
तीन अतिरिक्त कलवरी क्लास सबमरीन बनाने की संभावित योजना और प्रोजेक्ट 75(I) अलग-अलग हैं. कलवरी क्लास की अतिरिक्त पनडुब्बियों का उद्देश्य मौजूदा बेड़े और निर्माण व्यवस्था को आगे बढ़ाना है, जबकि प्रोजेक्ट 75(I) अधिक आधुनिक तकनीक वाली पनडुब्बियां विकसित करने पर केंद्रित है. दोनों परियोजनाओं की लागत, समय-सीमा और निर्माण की दिशा सरकारी मंजूरी तथा संबंधित समझौतों पर निर्भर करेगी.
समुद्री सुरक्षा के लिए क्यों अहम हैं आधुनिक पनडुब्बियां?
पनडुब्बियां समुद्र में गुप्त निगरानी, दुश्मन की नौसैनिक गतिविधियों पर नजर रखने और रणनीतिक अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. हिंद महासागर में बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों के बीच भारत के लिए पर्याप्त संख्या में आधुनिक और प्रभावी पनडुब्बियां बनाए रखना जरूरी है. यदि तीन अतिरिक्त कलवरी क्लास सबमरीन की योजना को मंजूरी मिलती है, तो इससे भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता बनाए रखने और घरेलू रक्षा निर्माण को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है. हालांकि, इस प्रस्ताव का वास्तविक असर इसकी अंतिम मंजूरी, तकनीकी बदलावों और निर्माण की समय-सीमा स्पष्ट होने के बाद ही सामने आएगा.
ये भी पढ़ें- ग्लोबल इकोनॉमी में भारत का दबदबा, IMF ने बढ़ाया GDP ग्रोथ का अनुमान, 2026 में 7% रहेगी GDP