Israel Hezbollah Ceasefire: मध्य पूर्व एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां युद्ध और शांति के बीच की दूरी बेहद कम नजर आ रही है. एक ओर ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने की चेतावनी देकर वैश्विक चिंताएं बढ़ा दी हैं, तो दूसरी ओर इजराइल और हिज्बुल्लाह के बीच लंबे समय से जारी संघर्ष को रोकने के लिए सीजफायर पर सहमति बन गई है. इस घटनाक्रम को क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, हालांकि इसकी सफलता पूरी तरह जमीन पर इसके पालन पर निर्भर करेगी.
कूटनीतिक प्रयासों से बनी सहमति
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, इजराइल और हिज्बुल्लाह के बीच युद्धविराम शुक्रवार को स्थानीय समयानुसार शाम चार बजे से प्रभावी होगा. इस समझौते को अंतिम रूप देने में अमेरिका, कतर और ईरान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. पिछले कई दिनों से इन देशों के प्रतिनिधि लगातार बातचीत में जुटे हुए थे ताकि सीमा पर बढ़ते तनाव को नियंत्रित किया जा सके.
क्षेत्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि लेबनान सीमा पर लगातार बढ़ती हिंसा ने बड़े स्तर पर चल रही राजनीतिक और सुरक्षा वार्ताओं को प्रभावित करना शुरू कर दिया था. ऐसे में सभी पक्षों के लिए संघर्ष को सीमित करना एक रणनीतिक आवश्यकता बन गया था.
गोलीबारी के बीच हुआ समझौता
दिलचस्प बात यह है कि सीजफायर की घोषणा ऐसे समय में हुई जब एक दिन पहले ही इजराइली सेना और हिज्बुल्लाह के लड़ाकों के बीच फिर से हिंसक झड़पें हुई थीं. दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर हमलों के आरोप लगाए थे और सीमा क्षेत्र में तनाव अपने चरम पर पहुंचता दिखाई दे रहा था. दक्षिणी लेबनान में इजराइली सैन्य अभियानों और उसके जवाब में हिज्बुल्लाह की कार्रवाई ने हालात को और गंभीर बना दिया था. रिपोर्टों के अनुसार, हालिया हमलों में कई लोगों की जान गई, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता और बढ़ गई थी.
इजराइल और लेबनान के अलग-अलग दावे
सीजफायर के बावजूद दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. लेबनान के अधिकारियों का कहना है कि इजराइल के लगातार सैन्य अभियान शांति प्रयासों को नुकसान पहुंचा रहे हैं और क्षेत्र को स्थिरता से दूर ले जा रहे हैं. वहीं इजराइल का तर्क है कि उत्तरी इलाकों में रहने वाले उसके नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है. इजराइली नेतृत्व का कहना है कि हिज्बुल्लाह के हमलों को रोकने के लिए सैन्य कार्रवाई आवश्यक थी और यह आत्मरक्षा का हिस्सा है.
ईरान की भूमिका क्यों बनी अहम?
इस पूरे घटनाक्रम में ईरान की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है. ईरान पहले ही संकेत दे चुका था कि लेबनान में हालात उसके व्यापक क्षेत्रीय रुख और अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं को प्रभावित कर सकते हैं. वहीं अमेरिका भी लगातार यह कहता रहा है कि मध्य पूर्व में अलग-अलग मोर्चों पर बढ़ता तनाव किसी भी बड़े समझौते के लिए खतरा बन सकता है.
हिज्बुल्लाह से जुड़े एक सांसद ने रॉयटर्स को बताया कि ईरान ने संगठन को स्पष्ट संदेश दिया था कि जब तक पूर्ण रूप से युद्धविराम लागू नहीं होता, तब तक वॉशिंगटन के साथ किसी बड़ी बातचीत को आगे बढ़ाना मुश्किल होगा. इससे साफ है कि लेबनान की स्थिति केवल स्थानीय संघर्ष नहीं बल्कि व्यापक क्षेत्रीय राजनीति से भी जुड़ी हुई है.
क्या टिक पाएगा यह युद्धविराम?
हालांकि सीजफायर की घोषणा ने राहत की उम्मीद जगाई है, लेकिन इसके भविष्य को लेकर अभी भी सवाल बने हुए हैं. अतीत में इजराइल और हिज्बुल्लाह के बीच हुए कई संघर्ष विराम समझौते लंबे समय तक टिक नहीं पाए थे. छोटी घटनाओं और सीमाई झड़पों ने कई बार शांति प्रयासों को कमजोर किया है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार सबसे बड़ी चुनौती युद्धविराम की निगरानी और उसके सख्त पालन को सुनिश्चित करना होगी. यदि दोनों पक्ष संयम बरतते हैं और मध्यस्थ देश सक्रिय भूमिका निभाते हैं, तो यह समझौता क्षेत्र में स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत साबित हो सकता है.
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