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शेख हसीना वाजेद को अपना देश छोड़ 6 साल तक भारत की राजधानी दिल्ली में अपनी पहचान छुपाकर रहना पड़ा था.


साल 1975 यहां भारत में स्वतंत्रता दिवस था, लेकिन धनमोड़ी में गोलियों की आवाज आई, यह पता बांग्लादेश के बंगबंधु कहे जाने वाले शेख मुजीबुर्रहमान का था.


शेख मुजीबुर्रहमान उस समय बांग्लादेश के राष्ट्रपति थे. गोलियों की आवाज सुन शेख मुजीबुर्रहमान ने खुद को परिवार समेत एक कमरे में बंद कर लिया था.


मुजीबुर्रहमान ने हिम्मत दिखाई कमरे से बाहर आए. जैसे ही वह बाहर आए उनके सामने दो नौजवान बन्दूक लिए खड़े थे.


बांग्लादेश से 7 हजार 287 किलोमिटर दूर जर्मनी में फोन की रिंग बजी. खबर मिलती है कि बांग्लादेश में शेख मुजीबुर्रहमान की परिवार समेत हत्या कर दी गई है.


फोन पर दूसरी तरफ कोई और नहीं बल्कि शेख मुजीबुर्रहमान की सबसे बड़ी बेटी शेख हसीना थी.


दरअसल शेख हसीना और उनकी छोटी बहन शेख रेहाना दोनों ही बांग्लादेश में नहीं थीं. मतलब साफ था, शेख हसीना अपने पिता के अंतिम दर्शन के लिए भी बांग्लादेश नहीं लौट सकतीं थीं.


सभी तरफ से निराश और दुखी शेख हसीना के लिए भारत से मदद आई, दिल्ली के लाजपत नगर रिंग रोड पास एक घर में कड़ी सुरक्षा के बीच शेख हसीना और उनके परिवार को रखा गया.


शेख हसीना भारत में 6 साल तक अपना नाम और पहचान बदलकर रह रही थी.

