Political Popcorn: बैलेट पेपर पर भी कांग्रेस का स्कोर शून्य, हार पर भाजपा के तंज से गरमाई सियासत

Political Popcorn: एमएलसी चुनाव में बैलेट पेपर से मतदान के बावजूद कांग्रेस का खाता नहीं खुला. नतीजों के बाद भाजपा ने पार्टी पर निशाना साधते हुए ईवीएम और वोट चोरी के मुद्दे पर तंज कसा, तो वहीं कर्नाटक से उत्तराखंड तक कांग्रेस की अंदरूनी चुनौतियां भी चर्चा में आ गईं.

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Political Popcorn

1.बैलेट की मांग, कागज़ का वार और कांग्रेस का स्कोर 'शून्य'!

ईवीएम की रार के बीच मतपत्रों ने दिखाया आईना, अब बहाने की नई तलाश?

​दिन-रात ईवीएम पर शक की सुई अड़ाने और मतपत्रों की पुरानी रिवायत वापस लाने का राग अलापने वाले विपक्षी खेमे के लिए 28 एमएलसी सीटों के चुनावी नतीजों ने बड़ा असमंजस खड़ा कर दिया है,क्योंकि यहां कोई चिप या मशीन नहीं बल्कि विशुद्ध रूप से बैलेट पेपर के जरिए मतदान हुआ था फिर भी कांग्रेस का स्कोर 'शून्य' पर सिमट कर रह गया. अलबत्ता सत्ता पक्ष इस नतीजे को सुशासन और विकास पर जनता की मुहर बताकर विपक्ष पर चुटकी ले रहा है कि माध्यम चाहे डिजिटल चिप हो या सादा कागज़, जनादेश का रुख साफ नजर आता है. सचमुच इस करारी शिकस्त के बाद कांग्रेस के अंदरूनी गलियारों में भारी आत्ममंथन और असहज सन्नाटा पसर गया है, जहां पार्टी के रणनीतिकार अब बंद कमरों में यह सिर धुन रहे हैं कि अगर मतपत्रों पर भी जनता हाथ थामने को राजी नहीं है तो ईवीएम विरोधी मुहिम और देशव्यापी बैलेट की मांग को आखिर किस मुंह से आगे बढ़ाया जाएगा. राजनीतिक प्रेक्षक इसे विपक्ष की नैरेटिव-बिल्डिंग पर लगा सबसे तीखा ब्रेक मान रहे हैं, मगर सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही बना हुआ है कि क्या पार्टी अब हार के लिए तकनीक और कागज़ से परे हटकर अपनी सांगठनिक कमजोरी पर गौर फरमाएगी या फिर किसी नए सियासी बहाने की पटकथा तैयार होगी?

2.कैमरे का पर्दा गिरा और 'मेंशनिंग' की बत्ती बुझी !

सीजेआई की दो टूक: क्या यह सब मीडिया की सुर्खियों के लिए था?

सर्वोच्च अदालत के कोर्ट रूम नंबर 1 में सुबह-सुबह होने वाली 'मेंशनिंग' की लाइव स्ट्रीमिंग पर सीजेआई सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने अचानक पर्दा गिरा दिया है. दरअसल इस सख्त कदम की पृष्ठभूमि उस वाकये से जुड़ी है जब सीजेआई ने एक वकील की नाटकीय दलीलों पर गहरी नाराजगी जताते हुए सख्त लहजे में पूछ लिया था "क्या आप यह सब मीडिया के लिए कह रहे हैं?" सचमुच, अदालती बहसों के लाइव टेलीकास्ट के दौर में जब गंभीर कानूनी तर्कों की जगह कैमरों की टीआरपी और सोशल मीडिया की सुर्खियां लेने की होड़ दिखने लगे, तो पीठ का खफा होना लाजिमी है. अलबत्ता अदालती पारदर्शिता के पैरोकार इसे तकनीकी ठहराव मान सकते हैं, लेकिन बेंच ने साफ संदेश दे दिया कि इंसाफ की चौखट को प्रचार का मंच नहीं बनने दिया जाएगा. राजनीतिक प्रेक्षक और कानूनी गलियारे इस फैसले को अनुशासन की बहाली के तौर पर देख रहे हैं. अब यक्ष प्रश्न यही है कि क्या इस ब्लैकआउट से अदालती मर्यादा और वकीलों की सुर्खियां बटोरने की आदत पर मुकम्मल लगाम लग पाएगी?

​3. 'सैर-सपाटे' पर तंज और 'वोट चोरी' के नारे की हवा !

​भाजपा ने कांग्रेस को दी 'कामचोरी' छोड़ने की नसीहत!

बैलेट पेपर से हुए चुनावों में भी कांग्रेस का खाता न खुलने के बाद दिल्ली में भाजपा ने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस सजाकर विपक्ष पर तीखे व्यंग्य बाण चलाए. सत्ता पक्ष के प्रवक्ताओं ने चुटकी लेते हुए कहा कि जब जनता के बीच पसीना बहाने के बजाय सैर-सपाटे की सियासत की जाएगी, तो जनसमर्थन की उम्मीद बेमानी है,कामचोरी की आदत छोड़ दी जाए तो वोट चोरी का रोना अपने आप खत्म हो जाएगा. अलबत्ता भाजपा का सीधा तर्क था कि कांग्रेस अपनी लगातार हार का ठीकरा कभी ईवीएम पर तो कभी वोटर लिस्ट पर फोड़ती है, लेकिन इस बार जब चुनाव कागजी मतपत्रों से हुए तब भी नतीजा 'शून्य' ही निकला. सचमुच जनता के बीच लगातार रहने से ही वोटों की फसल कटती है, केवल तकनीकी खामियां गिनाने से नहीं. राजनीतिक प्रेक्षक इसे भाजपा द्वारा कांग्रेस के चुनावी नैरेटिव की हवा निकालने की सधी हुई रणनीति बता रहे हैं. ऐसे में यक्ष प्रश्न यही बचता है कि क्या राहुल गांधी और उनकी टीम इस नसीहत से सबक लेकर जमीन पर उतरेंगे ?

​4. कर्नाटक के 'शून्य' पर आलाकमान का पारा सातवें आसमान पर !

एमएलसी चुनाव में सूपड़ा साफ, खरगे-राहुल ने 3 दिन में तलब की रिपोर्ट!

कर्नाटक विधान परिषद की सभी सीटों पर मिली करारी शिकस्त ने दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक कांग्रेस के तंबू हिलाकर रख दिए हैं. अपनी ही सत्ता वाले मजबूत राज्य में एक भी सीट न जीत पाने के शर्मनाक नतीजे से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी बुरी तरह बिफर पड़े हैं. नाराजगी की इंतहा यह रही कि प्रदेश प्रभारी रणदीप सुरजेवाला के जरिए मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष को 3 दिन के भीतर जवाबदेही तय करने और विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का सख्त अल्टीमेटम थमा दिया गया है. सचमुच जब अपने ही गढ़ में सत्तारूढ़ पार्टी का स्कोर 'शून्य' रह जाए, तो अंदरूनी गुटबाजी और ओवरकॉन्फिडेंस का पर्दाफाश होना तय है. अलबत्ता राज्य इकाई अब तक यह तय नहीं कर पा रही है कि इस नाकामी का ठीकरा सरकार के सिर फोड़ा जाए या संगठन के माथे. राजनीतिक प्रेक्षक इसे सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की आपसी खींचतान का दुष्परिणाम मान रहे हैं. अब यक्ष प्रश्न यही है कि तीन दिन के भीतर आने वाली यह रिपोर्ट केवल कागजी लीपापोती साबित होगी या किसी बड़े नेता पर कार्रवाई की गाज गिरेगी?

5.पहाड़ों में बगावती सुगबुगाहट और दिल्ली का तलबनामा !

​हरीश के बाद प्रीतम के तेवर तल्ख, प्रभारी शैलजा पर साधे निशाने!

उत्तराखंड कांग्रेस की अंदरूनी सियासत में बर्फबारी से पहले ही सियासी पारा उबलने लगा है. पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के बाद अब छह बार के वरिष्ठ विधायक प्रीतम सिंह ने सीधे नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए दो टूक कह दिया कि 'सूबे की राजनीतिक संस्कृति में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा.' उनका सीधा निशाना प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा की कार्यशैली पर टिका, जिससे तल्खी इतनी बढ़ी कि दिल्ली में संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल को फौरन अलर्ट होकर प्रीतम सिंह को तलब करना पड़ा. अलबत्ता, मामले की गंभीरता को भांपते हुए सुलह-सफाई का जिम्मा कांग्रेस नेता गुरदीप सिंह सप्पल को मध्यस्थ बनाकर सौंपा गया है. सचमुच जब सूबे के बड़े क्षत्रप ही हाईकमान के नुमाइंदों के खिलाफ ताल ठोकने लगें तो चुनावी जमीन तैयार करने से पहले अपनी ही दरारें पाटना मुश्किल हो जाता है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे पुरानी गुटबाजी का नया उभार मान रहे हैं,लेकिन यक्ष प्रश्न यही बना हुआ है कि क्या सप्पल की मध्यस्थता इस असंतोष की आग को बुझा पाएगी या चिंगारी और भड़केगी?

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