जलवायु परिवर्तन का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है. कहीं भीषण गर्मी लोगों की जान ले रही है, तो कहीं बाढ़ और सूखे से घर, खेत और फसलें बर्बाद हो रही हैं. इसका सबसे ज्यादा नुकसान गरीब परिवारों को उठाना पड़ता है, क्योंकि उनके पास इन हालात से उबरने के लिए पर्याप्त पैसे और संसाधन नहीं होते. अब ऑक्सफैम की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दुनिया के सबसे अमीर लोगों का कार्बन उत्सर्जन जलवायु संकट को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है.
रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के सबसे अमीर 0.1 फीसदी लोगों का कार्बन उत्सर्जन सबसे गरीब 44 फीसदी आबादी के कुल उत्सर्जन से भी ज्यादा है. यह आंकड़ा दिखाता है कि जलवायु संकट केवल पर्यावरण से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि इसका संबंध अमीर और गरीब के बीच बढ़ती असमानता से भी है.
80 लाख अमीरों का प्रदूषण, करोड़ों लोगों पर भारी
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के करीब 80 लाख सबसे अमीर लोगों से होने वाला प्रदूषण लगभग 350 करोड़ लोगों के कुल उत्सर्जन से ज्यादा है. वहीं, दुनिया के सबसे अमीर 0.1 फीसदी लोगों के पास कुल वैश्विक संपत्ति का करीब 19 फीसदी हिस्सा है.
अमीर लोगों की जीवनशैली और उनके निवेश से होने वाला कार्बन उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देता है. दूसरी ओर, बाढ़, सूखे और भीषण गर्मी जैसी आपदाओं का सामना गरीब परिवारों को ज्यादा करना पड़ता है. आर्थिक तंगी के कारण उनके लिए अपना घर, रोजगार और रोजमर्रा की जिंदगी दोबारा पटरी पर लाना मुश्किल हो जाता है.
प्राइवेट जेट और आलीशान जीवनशैली से बढ़ रहा प्रदूषण
बहुत अमीर लोग निजी विमानों, महंगी गाड़ियों, बड़े घरों और ज्यादा बिजली खर्च करने वाली सुविधाओं का इस्तेमाल करते हैं. इनकी वजह से उनका कार्बन फुटप्रिंट बढ़ता है. इसके अलावा, तेल, गैस और कोयले जैसे प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों में उनका निवेश भी उत्सर्जन बढ़ाने में योगदान देता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के निजी विमान केवल दो सेकंड में उतना कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित कर देते हैं, जितना दुनिया की सबसे गरीब आधी आबादी पूरे एक साल में करती है. साल 2025 में निजी विमानों से करीब 1.6 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ. दुनिया में लगभग 2.50 लाख लोग ही निजी विमानों का इस्तेमाल करते हैं.
हालांकि, जलवायु परिवर्तन के लिए केवल अमीरों की जीवनशैली जिम्मेदार नहीं है. बिजली उत्पादन, उद्योग, परिवहन और खेती जैसी गतिविधियों से भी ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं. रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले लोगों और कंपनियों की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए.
जलवायु संकट में गरीबों को सबसे ज्यादा नुकसान
जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर असर उन लोगों पर पड़ता है, जिनके पास आर्थिक संसाधन कम हैं. अमीर परिवार आपदा के बाद अपना घर और कारोबार दोबारा खड़ा कर सकते हैं, लेकिन गरीबों के लिए ऐसा करना काफी मुश्किल होता है.
रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक, दुनिया के सबसे अमीर 0.1 फीसदी लोगों में से हर एक के सालाना कार्बन उत्सर्जन के कारण भविष्य में गर्मी से जुड़ी करीब 19 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं. रिपोर्ट यह भी बताती है कि अधिक असमानता वाले देशों में बाढ़ से होने वाली मौतों की संख्या कम असमानता वाले देशों की तुलना में सात गुना ज्यादा है.
इसके अलावा, जलवायु संकट के कारण साल 2050 तक दुनिया में करीब एक अरब लोगों को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. यानी दुनिया में हर 10 में से एक व्यक्ति को विस्थापन का सामना करना पड़ सकता है. इसका बड़ा असर ग्लोबल साउथ के देशों में रहने वाले लोगों पर पड़ने की आशंका है.
खाने-पीने की चीजों के दाम भी बढ़ सकते हैं
जलवायु परिवर्तन का असर खेती और खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी पड़ता है. बारिश के समय में बदलाव, सूखा और बढ़ता तापमान फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं. इससे अनाज और दूसरी खाद्य वस्तुओं का उत्पादन घट सकता है, जिसके कारण कीमतें बढ़ने की आशंका रहती है.
गरीब परिवार अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा खाने-पीने की चीजों पर खर्च करते हैं. ऐसे में खाद्य पदार्थ महंगे होने पर उनके लिए इलाज, बच्चों की पढ़ाई और घर के दूसरे जरूरी खर्च पूरे करना भी मुश्किल हो जाता है.
प्रदूषण फैलाने के बाद आपदाओं से भी कमाई?
ऑक्सफैम की रिपोर्ट में यह भी सवाल उठाया गया है कि कुछ कंपनियां प्रदूषण फैलाने वाले कारोबार से कमाई करती हैं और आपदाओं के बाद राहत, बचाव तथा पुनर्निर्माण से जुड़े कारोबार में भी फायदा उठाती हैं.
रिपोर्ट के नए ‘डिस्ट्रॉय एंड रीबिल्ड इंडेक्स’ में ऐसी 217 कंपनियों की पहचान की गई है, जिनका कारोबार प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के साथ-साथ आपदाओं से बचाव और उनके बाद दोबारा निर्माण से भी जुड़ा है.
रिपोर्ट के अनुसार, इन कंपनियों ने साल 2025 में औसतन 1.8 अरब डॉलर की कमाई की और अपने शेयरधारकों को औसतन एक अरब डॉलर से ज्यादा का भुगतान किया. वहीं, आपदाओं में अपना घर और रोजगार गंवाने वाले गरीब परिवारों को दोबारा खड़े होने में कई साल लग सकते हैं. इस दौरान उन्हें कर्ज का बोझ भी उठाना पड़ता है.
ऑक्सफैम का अनुमान है कि आपदाओं से उबरने और पुनर्निर्माण का वैश्विक बाजार साल 2029 तक बढ़कर सालाना 92 अरब डॉलर का हो सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन से जुड़ी गंभीर मौसमी घटनाओं में बढ़ोतरी इस बाजार के विस्तार की एक वजह है.