1. 2029 की भविष्यवाणी!
अमित शाह का पलटवार.. ‘विपक्ष 2029 में चौथी हार के लिए तैयार रहे’
चुनावी घमासान के बीच केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने विपक्ष की आक्रामकता का जवाब बेहद नपे-तुले राजनीतिक आत्मविश्वास के साथ दिया. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि संवैधानिक संस्थाओं पर ठीकरा फोड़ने के बजाय कांग्रेस को जनता के मिजाज को समझना चाहिए, वरना 2029 में चौथी बार मात तय है. सरकारी रणनीतिकारों का मानना है कि विपक्ष मुद्दों के अभाव में अनावश्यक टकराव की राह चुन रहा है. अलबत्ता विपक्षी रणनीतिकार इसे सरकार की घबराहट करार देकर दावा कर रहे हैं कि जमीन पर सत्ता विरोधी लहर पनप रही है. इस जुबानी जंग के बीच राजनीतिक प्रेक्षक कह रहे हैं कि अभी 2026 चल रहा है और दोनों खेमे 2029 के स्कोरकार्ड का हिसाब आज ही चुकता करने पर आमादा हैं. सचमुच भारतीय राजनीति में भविष्य की तारीखें तय करना सबसे पसंदीदा शगल बन चुका है. ऐसे में यक्ष प्रश्न यही है कि क्या जनमत का फैसला बयानों से तय होगा या जमीन पर किए गए कामों से?
2. साहब चले दिल्ली, कुर्सी को मिला पंख!
राजस्थान DGP राजीव शर्मा के डिप्टी NSA बनने की सुगबुगाहट!
जयपुर से लेकर नई दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक और सरदार पटेल भवन तक इन दिनों एक ही नाम की गूंज है,राजस्थान के पुलिस महानिदेशक राजीव शर्मा राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में डिप्टी एनएसए के कुल तीन पद मुकर्रर हैं, जिनमें एक की कमान विदेश सेवा (IFS) के पास रहती है और दो पद आईपीएस कैडर के धुरंधरों के लिए आरक्षित होते हैं. सियासी और प्रशासनिक गणित यह है कि फिलहाल आईपीएस कैडर का एक पद खाली पड़ा है, और इसी रिक्त पायदान पर राजस्थान डीजीपी की ताजपोशी की संभावनाओं ने पंख पसार लिए हैं. अपने शानदार और बेदाग सर्विस रिकॉर्ड के चलते करियर का बड़ा हिस्सा केंद्र की प्रतिनियुक्ति में गुजारने वाले राजीव शर्मा का यह दांव मुफीद बैठता भी दिख रहा है !अलबत्ता सेवा के बहीखाते के हिसाब से उनका रिटायरमेंट अगले साल जुलाई 2027 में तय है, लेकिन डिप्टी एनएसए के पद का नियम कम से कम 2 साल के कार्यकाल की गारंटी देता है. ऐसे में राजनीतिक प्रेक्षक इस गणित को डिकोड कर रहे हैं कि यदि अभी दिल्ली रवानगी पर मुहर लगी, तो जुलाई 2027 में रिटायरमेंट की दहलीज पर खड़े डीजीपी साहब को इसी पद पर सेवा विस्तार का सीधा फायदा मिल जाएगा!
3. विपक्षी बैठक के बंद दरवाजों से छनकर आई चटपटी खबर!
‘कुनबा बड़ा करने चले थे, दरवाजे पर ही ताला लग गया!’
विपक्षी एकता के बड़े-बड़े दावों के बीच इंडी गठबंधन की बंद कमरे वाली बैठक से ऐसी अंदरूनी खिचड़ी की खुशबू आई है, जिसने एकता के मंच पर ही सस्पेंस बढ़ा दिया. एजेंडा था कुनबे को और बड़ा करने का, लेकिन जैसे ही आम आदमी पार्टी और चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ की आज़ाद समाज पार्टी को गठबंधन के पाले में खींचने की बात उठी, मेज पर सन्नाटा नहीं, सीधा विरोध पसर गया. कांग्रेस ने 'आप' के नाम पर भौंहें तानीं तो हैरतअंगेज तौर पर तेजस्वी यादव और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने भी कांग्रेस के ऐतराज पर खुलकर सिर हिला दिया. दूसरी तरफ पश्चिमी यूपी से संसद पहुंचे चंद्रशेखर ‘रावण’ की एंट्री की बात आते ही समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव ने दो टूक शब्दों में ‘ना’ कह दिया, आखिर अपने ही सियासी आंगन में किसी नए दावेदार को जगह देना नेताजी की विरासत के अनुकूल कैसे बैठता? अलबत्ता गठबंधन के बड़े रणनीतिकार बाहर आकर मुस्कुराते चेहरों के साथ ‘सब ठीक है’ का संदेश देने की भरसक कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अंदरूनी हकीकत यही रही कि दोनों दलों को फिलहाल ‘नो-एंट्री’ का बोर्ड थमाकर दूरी बनाए रखने का फैसला कर लिया गया. राजनीतिक प्रेक्षक चुटकी ले रहे हैं कि विपक्षी गठबंधन में सीटें बांटना तो दूर, अभी सोफे पर बैठने की जगह तय करने में ही पसीने छूट रहे हैं!
4. ‘चेन्नई एक्सप्रेस.. प्रधानमंत्री की चाय और गवर्नर की पक्की कुर्सी!’
PM मोदी के चेन्नई दौरे के 24 घंटे बाद बड़ा प्रशासनिक दांव!
दक्षिण की राजनीति में टाइमिंग का ऐसा अनूठा संयोग बहुत कम देखने को मिलता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 अक्टूबर को चेन्नई की सरजमीं पर कदम रखते हैं, तमिलनाडु के नए राजनीतिक सितारे और टीवीके के नेतृत्व वाले मुख्यमंत्री जोसेफ विजय से गर्मजोशी भरी मुलाकात होती है और ठीक अगले ही दिन 12 अक्टूबर को राष्ट्रपति भवन से मुहर लग जाती है कि राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर अब तमिलनाडु के स्थायी गवर्नर होंगे. याद दिला दें कि मार्च 2026 से अर्लेकर साहब केरल के साथ-साथ तमिलनाडु का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे थे, लेकिन पीएम के दौरे की धूल थमी भी नहीं थी कि उन्हें राजभवन की मुकम्मल चाबी सौंप दी गई.अलबत्ता जानकार सूत्र और राजनीतिक प्रेक्षक इस पूरी क्रोनोलॉजी को महज एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया मानने को कतई तैयार नहीं हैं. गलियारों में साफ चर्चा है कि यह केंद्र सरकार का एक बेहद नपा-तुला और सोचा-समझा कदम है, जिसका सीधा मकसद केंद्र और विजय प्रशासन के बीच पुराने टकरावों से दूर एक सहज, दोस्ताना और बेहतर प्रशासनिक तालमेल कायम करना है!
5. ‘कैमरा चालू था, पर साहब कैसेट ही गुम हो गई!’
कर्नाटक चुनावी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का चुनाव आयोग को कड़ा अल्टीमेटम!
कर्नाटक के शृंगेरी विधानसभा सीट पर कांग्रेस के टीडी राजेगौड़ा और बीजेपी के डीएन जीवराजा के बीच वोटों की दोबारा गिनती का विवाद अब सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने पहुंच गया है, जहां चुनाव आयोग की दलीलें खुद सवालों के घेरे में आ गई हैं. जब रीकाउंटिंग की ओरिजिनल वीडियो रिकॉर्डिंग तलब की गई, तो आयोग के वकील ने बड़ी मासूमियत से कह दिया कि ‘रिकॉर्ड मिल नहीं रहा, खोजने की कोशिश जारी है.’ इस पर अदालत हैरान भी हुई और नाराज भी. मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने सख्त लहजे में आयोग को आईना दिखाते हुए पूछ डाला कि देश का सबसे बड़ा चुनाव कराने वाला संवैधानिक संस्थान भला यह कैसे कह सकता है कि उसका रिकॉर्ड ही गुम हो गया ?बेंच ने साफ चेतावनी दे डाली कि अगली तारीख पर जो कुछ भी दस्तावेज बचे हैं, अदालत के सामने पेश किए जाएं. राजनीतिक प्रेक्षक चुटकी ले रहे हैं कि आधुनिक डिजिटल युग में जब हर सेकंड का बैकअप क्लाउड पर तैरता है, तब चुनाव आयोग का वीडियो न मिलना वाकई एक हैरतअंगेज पहेली है!
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